Book 2 • Chapter 46
Section 46
10 verses
Verse 1
धन्य जनमु जगतीतल तासू पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू
Verse 2
चारि पदारथ करतल ताकें प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें
Verse 3
आयसु पालि जनम फलु पाई ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई
Verse 4
बिदा मातु सन आवउँ मागी चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी
Verse 5
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा
Verse 6
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी
Verse 7
सुनि भए बिकल सकल नर नारी बेलि बिटप जिमि देखि दवारी
Verse 8
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई
Verse 9
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ
Verse 10
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ
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