Book 2 • Chapter 47
Section 47
10 verses
Verse 1
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी
Verse 2
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ छाइ भवन पर पावकु धरेऊ
Verse 3
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा डारि सुधा बिषु चाहत चीखा
Verse 4
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी भइ रघुबंस बेनु बन आगी
Verse 5
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा
Verse 6
सदा रामु एहि प्रान समाना कारन कवन कुटिलपनु ठाना
Verse 7
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ
Verse 8
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई जानि न जाइ नारि गति भाई
Verse 9
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ
Verse 10
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ
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