Book 2 • Chapter 48
Section 48
10 verses
Verse 1
का सुनाइ बिधि काह सुनावा का देखाइ चह काह देखावा
Verse 2
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा
Verse 3
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु
Verse 4
एक धरम परमिति पहिचाने नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने
Verse 5
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी एक एक सन कहहिं बखानी
Verse 6
एक भरत कर संमत कहहीं एक उदास भायँ सुनि रहहीं
Verse 7
कान मूदि कर रद गहि जीहा एक कहहिं यह बात अलीहा
Verse 8
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे
Verse 9
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल
Verse 10
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल
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