Book 2 • Chapter 55
Section 55
10 verses
Verse 1
राखि न सकइ न कहि सक जाहू दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू
Verse 2
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू बिधि गति बाम सदा सब काहू
Verse 3
धरम सनेह उभयँ मति घेरी भइ गति साँप छुछुंदरि केरी
Verse 4
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू
Verse 5
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी संकट सोच बिबस भइ रानी
Verse 6
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी रामु भरतु दोउ सुत सम जानी
Verse 7
सरल सुभाउ राम महतारी बोली बचन धीर धरि भारी
Verse 8
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका पितु आयसु सब धरमक टीका
Verse 9
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु
Verse 10
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु
0:000:00
Speed: