Book 2 • Chapter 57
Section 57
10 verses
Verse 1
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई राखहुँ पलक नयन की नाई
Verse 2
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना
Verse 3
अस बिचारि सोइ करहु उपाई सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई
Verse 4
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ करि अनाथ जन परिजन गाऊँ
Verse 5
सब कर आजु सुकृत फल बीता भयउ कराल कालु बिपरीता
Verse 6
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी परम अभागिनि आपुहि जानी
Verse 7
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा बरनि न जाहिं बिलाप कलापा
Verse 8
राम उठाइ मातु उर लाई कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई
Verse 9
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ
Verse 10
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ
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