Book 2 • Chapter 60
Section 60
10 verses
Verse 1
बन हित कोल किरात किसोरी रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी
Verse 2
पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ
Verse 3
कै तापस तिय कानन जोगू जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू
Verse 4
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती चित्रलिखित कपि देखि डेराती
Verse 5
सुरसर सुभग बनज बन चारी डाबर जोगु कि हंसकुमारी
Verse 6
अस बिचारि जस आयसु होई मैं सिख देउँ जानकिहि सोई
Verse 7
जौं सिय भवन रहै कह अंबा मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा
Verse 8
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी सील सनेह सुधाँ जनु सानी
Verse 9
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष
Verse 10
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष
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