Book 1 • Chapter 1
Section 1
10 verses
Verse 1
बंदउ गुरु पद पदुम परागा सुरुचि सुबास सरस अनुरागा
Verse 2
अमिय मूरिमय चूरन चारू समन सकल भव रुज परिवारू
Verse 3
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती मंजुल मंगल मोद प्रसूती
Verse 4
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी किएँ तिलक गुन गन बस करनी
Verse 5
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती
Verse 6
दलन मोह तम सो सप्रकासू बड़े भाग उर आवइ जासू
Verse 7
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के मिटहिं दोष दुख भव रजनी के
Verse 8
सूझहिं राम चरित मनि मानिक गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक
Verse 9
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान
Verse 10
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान
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