Book 1 • Chapter 113
Section 113
10 verses
Verse 1
तदपि असंका कीन्हिहु सोई कहत सुनत सब कर हित होई
Verse 2
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना श्रवन रंध्र अहिभवन समाना
Verse 3
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा लोचन मोरपंख कर लेखा
Verse 4
ते सिर कटु तुंबरि समतूला जे न नमत हरि गुर पद मूला
Verse 5
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी जीवत सव समान तेइ प्रानी
Verse 6
जो नहिं करइ राम गुन गाना जीह सो दादुर जीह समाना
Verse 7
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती सुनि हरिचरित न जो हरषाती
Verse 8
गिरिजा सुनहु राम कै लीला सुर हित दनुज बिमोहनसीला
Verse 9
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि
Verse 10
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि
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