Book 1 • Chapter 114
Section 114
10 verses
Verse 1
रामकथा सुंदर कर तारी संसय बिहग उडावनिहारी
Verse 2
रामकथा कलि बिटप कुठारी सादर सुनु गिरिराजकुमारी
Verse 3
राम नाम गुन चरित सुहाए जनम करम अगनित श्रुति गाए
Verse 4
जथा अनंत राम भगवाना तथा कथा कीरति गुन नाना
Verse 5
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी
Verse 6
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई सुखद संतसंमत मोहि भाई
Verse 7
एक बात नहि मोहि सोहानी जदपि मोह बस कहेहु भवानी
Verse 8
तुम जो कहा राम कोउ आना जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना
Verse 9
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच
Verse 10
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच
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