Book 1 • Chapter 115
Section 115
10 verses
Verse 1
अग्य अकोबिद अंध अभागी काई बिषय मुकर मन लागी
Verse 2
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी
Verse 3
कहहिं ते बेद असंमत बानी जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी
Verse 4
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना राम रूप देखहिं किमि दीना
Verse 5
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका जल्पहिं कल्पित बचन अनेका
Verse 6
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं
Verse 7
बातुल भूत बिबस मतवारे ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे
Verse 8
जिन्ह कृत महामोह मद पाना तिन् कर कहा करिअ नहिं काना
Verse 9
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद
Verse 10
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम
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