Book 1 • Chapter 118
Section 118
10 verses
Verse 1
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई जदपि असत्य देत दुख अहई
Verse 2
जौं सपनें सिर काटै कोई बिनु जागें न दूरि दुख होई
Verse 3
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई
Verse 4
आदि अंत कोउ जासु न पावा मति अनुमानि निगम अस गावा
Verse 5
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना कर बिनु करम करइ बिधि नाना
Verse 6
आनन रहित सकल रस भोगी बिनु बानी बकता बड़ जोगी
Verse 7
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा
Verse 8
असि सब भाँति अलौकिक करनी महिमा जासु जाइ नहिं बरनी
Verse 9
जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान
Verse 10
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान
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