Book 1 • Chapter 119
Section 119
10 verses
Verse 1
कासीं मरत जंतु अवलोकी जासु नाम बल करउँ बिसोकी
Verse 2
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी रघुबर सब उर अंतरजामी
Verse 3
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं जनम अनेक रचित अघ दहहीं
Verse 4
सादर सुमिरन जे नर करहीं भव बारिधि गोपद इव तरहीं
Verse 5
राम सो परमातमा भवानी तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी
Verse 6
अस संसय आनत उर माहीं ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं
Verse 7
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना मिटि गै सब कुतरक कै रचना
Verse 8
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती दारुन असंभावना बीती
Verse 9
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि
Verse 10
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि
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