Book 1 • Chapter 120
Section 120
16 verses
Verse 1
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी मिटा मोह सरदातप भारी
Verse 2
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ
Verse 3
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा
Verse 4
अब मोहि आपनि किंकरि जानी जदपि सहज जड नारि अयानी
Verse 5
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू
Verse 6
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी सर्ब रहित सब उर पुर बासी
Verse 7
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू
Verse 8
उमा बचन सुनि परम बिनीता रामकथा पर प्रीति पुनीता
Verse 9
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
Verse 10
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान 120(क)
Verse 11
सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल
Verse 12
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड 120(ख)
Verse 13
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब
Verse 14
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ 120(ग)
Verse 15
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित
Verse 16
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु 120(घ
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