Book 1 • Chapter 125
Section 125
10 verses
Verse 1
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि बह समीप सुरसरी सुहावनि
Verse 2
आश्रम परम पुनीत सुहावा देखि देवरिषि मन अति भावा
Verse 3
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा भयउ रमापति पद अनुरागा
Verse 4
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी सहज बिमल मन लागि समाधी
Verse 5
मुनि गति देखि सुरेस डेराना कामहि बोलि कीन्ह सनमाना
Verse 6
सहित सहाय जाहु मम हेतू चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू
Verse 7
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा चहत देवरिषि मम पुर बासा
Verse 8
जे कामी लोलुप जग माहीं कुटिल काक इव सबहि डेराहीं
Verse 9
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज
Verse 10
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज
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