Book 1 • Chapter 126
Section 126
10 verses
Verse 1
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ निज मायाँ बसंत निरमयऊ
Verse 2
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा
Verse 3
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी काम कृसानु बढ़ावनिहारी
Verse 4
रंभादिक सुरनारि नबीना सकल असमसर कला प्रबीना
Verse 5
करहिं गान बहु तान तरंगा बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा
Verse 6
देखि सहाय मदन हरषाना कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना
Verse 7
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी निज भयँ डरेउ मनोभव पापी
Verse 8
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु बड़ रखवार रमापति जासू
Verse 9
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन
Verse 10
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन
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