Book 1 • Chapter 144
Section 144
10 verses
Verse 1
करहिं अहार साक फल कंदा सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा
Verse 2
पुनि हरि हेतु करन तप लागे बारि अधार मूल फल त्यागे
Verse 3
उर अभिलाष निंरंतर होई देखअ नयन परम प्रभु सोई
Verse 4
अगुन अखंड अनंत अनादी जेहि चिंतहिं परमारथबादी
Verse 5
नेति नेति जेहि बेद निरूपा निजानंद निरुपाधि अनूपा
Verse 6
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना उपजहिं जासु अंस तें नाना
Verse 7
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई भगत हेतु लीलातनु गहई
Verse 8
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा तौ हमार पूजहि अभिलाषा
Verse 9
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार
Verse 10
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार
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