Book 1 • Chapter 143
Section 143
10 verses
Verse 1
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा नारि समेत गवन बन कीन्हा
Verse 2
तीरथ बर नैमिष बिख्याता अति पुनीत साधक सिधि दाता
Verse 3
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा
Verse 4
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा ग्यान भगति जनु धरें सरीरा
Verse 5
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा हरषि नहाने निरमल नीरा
Verse 6
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी धरम धुरंधर नृपरिषि जानी
Verse 7
जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए मुनिन्ह सकल सादर करवाए
Verse 8
कृस सरीर मुनिपट परिधाना सत समाज नित सुनहिं पुराना
Verse 9
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग
Verse 10
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग
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