Book 1 • Chapter 146
Section 146
10 verses
Verse 1
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु बिधि हरि हर बंदित पद रेनू
Verse 2
सेवत सुलभ सकल सुख दायक प्रनतपाल सचराचर नायक
Verse 3
जौं अनाथ हित हम पर नेहू तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू
Verse 4
जो सरूप बस सिव मन माहीं जेहि कारन मुनि जतन कराहीं
Verse 5
जो भुसुंडि मन मानस हंसा सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा
Verse 6
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन कृपा करहु प्रनतारति मोचन
Verse 7
दंपति बचन परम प्रिय लागे मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे
Verse 8
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना बिस्वबास प्रगटे भगवाना
Verse 9
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम
Verse 10
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम
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