Book 1 • Chapter 163
Section 163
10 verses
Verse 1
जनि आचरुज करहु मन माहीं सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं
Verse 2
तपबल तें जग सृजइ बिधाता तपबल बिष्नु भए परित्राता
Verse 3
तपबल संभु करहिं संघारा तप तें अगम न कछु संसारा
Verse 4
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा कथा पुरातन कहै सो लागा
Verse 5
करम धरम इतिहास अनेका करइ निरूपन बिरति बिबेका
Verse 6
उदभव पालन प्रलय कहानी कहेसि अमित आचरज बखानी
Verse 7
सुनि महिप तापस बस भयऊ आपन नाम कहत तब लयऊ
Verse 8
कह तापस नृप जानउँ तोही कीन्हेहु कपट लाग भल मोही
Verse 9
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप
Verse 10
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव
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