Book 1 • Chapter 162
Section 162
10 verses
Verse 1
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं
Verse 2
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ
Verse 3
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें
Verse 4
अब जौं तात दुरावउँ तोही दारुन दोष घटइ अति मोही
Verse 5
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा
Verse 6
देखा स्वबस कर्म मन बानी तब बोला तापस बगध्यानी
Verse 7
नाम हमार एकतनु भाई सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई
Verse 8
कहहु नाम कर अरथ बखानी मोहि सेवक अति आपन जानी
Verse 9
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि
Verse 10
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि
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