Book 1 • Chapter 161
Section 161
12 verses
Verse 1
कह नृप जे बिग्यान निधाना तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना
Verse 2
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ
Verse 3
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें परम अकिंचन प्रिय हरि केरें
Verse 4
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा होत बिरंचि सिवहि संदेहा
Verse 5
जोसि सोसि तव चरन नमामी मो पर कृपा करिअ अब स्वामी
Verse 6
सहज प्रीति भूपति कै देखी आपु बिषय बिस्वास बिसेषी
Verse 7
सब प्रकार राजहि अपनाई बोलेउ अधिक सनेह जनाई
Verse 8
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला इहाँ बसत बीते बहु काला
Verse 9
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु
Verse 10
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु 161(क)
Verse 11
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर
Verse 12
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि 161(ख)
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