Book 1 • Chapter 160
Section 160
10 verses
Verse 1
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा
Verse 2
नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही चरन बंदी निज भाग्य सराही
Verse 3
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई
Verse 4
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी नाथ नाम निज कहहु बखानी
Verse 5
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना भूप सुह्रद सो कपट सयाना
Verse 6
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा छल बल कीन्ह चहइ निज काजा
Verse 7
समुझि राजसुख दुखित अराती अवाँ अनल इव सुलगइ छाती
Verse 8
सरल बचन नृप के सुनि काना बयर सँभारि हृदयँ हरषाना
Verse 9
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत
Verse 10
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति
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