Book 1 • Chapter 159
Section 159
12 verses
Verse 1
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ निज आश्रम तापस लै गयऊ
Verse 2
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी
Verse 3
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें सुंदर जुबा जीव परहेलें
Verse 4
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें देखत दया लागि अति मोरें
Verse 5
नाम प्रतापभानु अवनीसा तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा
Verse 6
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई बडे भाग देखउँ पद आई
Verse 7
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा जानत हौं कछु भल होनिहारा
Verse 8
कह मुनि तात भयउ अँधियारा जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा
Verse 9
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान
Verse 10
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान 159(क)
Verse 11
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ
Verse 12
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ 159(ख)
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