Book 1 • Chapter 170
Section 170
10 verses
Verse 1
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी आसन जाइ बैठ छलग्यानी
Verse 2
श्रमित भूप निद्रा अति आई सो किमि सोव सोच अधिकाई
Verse 3
कालकेतु निसिचर तहँ आवा जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा
Verse 4
परम मित्र तापस नृप केरा जानइ सो अति कपट घनेरा
Verse 5
तेहि के सत सुत अरु दस भाई खल अति अजय देव दुखदाई
Verse 6
प्रथमहि भूप समर सब मारे बिप्र संत सुर देखि दुखारे
Verse 7
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा
Verse 8
जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ भावी बस न जान कछु राऊ
Verse 9
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु
Verse 10
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु
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