Book 1 • Chapter 173
Section 173
10 verses
Verse 1
उपरोहित जेवनार बनाई छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई
Verse 2
मायामय तेहिं कीन्ह रसोई बिंजन बहु गनि सकइ न कोई
Verse 3
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा
Verse 4
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए पद पखारि सादर बैठाए
Verse 5
परुसन जबहिं लाग महिपाला भै अकासबानी तेहि काला
Verse 6
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू
Verse 7
भयउ रसोईं भूसुर माँसू सब द्विज उठे मानि बिस्वासू
Verse 8
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी भावी बस आव मुख बानी
Verse 9
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार
Verse 10
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार
0:000:00
Speed: