Book 1 • Chapter 174
Section 174
10 verses
Verse 1
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई घालै लिए सहित समुदाई
Verse 2
ईस्वर राखा धरम हमारा जैहसि तैं समेत परिवारा
Verse 3
संबत मध्य नास तव होऊ जलदाता न रहिहि कुल कोऊ
Verse 4
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा भै बहोरि बर गिरा अकासा
Verse 5
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा
Verse 6
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी भूप गयउ जहँ भोजन खानी
Verse 7
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा फिरेउ राउ मन सोच अपारा
Verse 8
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई
Verse 9
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर
Verse 10
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर
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