Book 1 • Chapter 179
Section 179
10 verses
Verse 1
रहे तहाँ निसिचर भट भारे ते सब सुरन्ह समर संघारे
Verse 2
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे रच्छक कोटि जच्छपति केरे
Verse 3
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई
Verse 4
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई जच्छ जीव लै गए पराई
Verse 5
फिरि सब नगर दसानन देखा गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा
Verse 6
सुंदर सहज अगम अनुमानी कीन्हि तहाँ रावन रजधानी
Verse 7
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे सुखी सकल रजनीचर कीन्हे
Verse 8
एक बार कुबेर पर धावा पुष्पक जान जीति लै आवा
Verse 9
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ
Verse 10
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ
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