Book 1 • Chapter 178
Section 178
12 verses
Verse 1
तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए हरषित ते अपने गृह आए
Verse 2
मय तनुजा मंदोदरि नामा परम सुंदरी नारि ललामा
Verse 3
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी होइहि जातुधानपति जानी
Verse 4
हरषित भयउ नारि भलि पाई पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई
Verse 5
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी
Verse 6
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा कनक रचित मनिभवन अपारा
Verse 7
भोगावति जसि अहिकुल बासा अमरावति जसि सक्रनिवासा
Verse 8
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका जग बिख्यात नाम तेहि लंका
Verse 9
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव
Verse 10
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव 178(क)
Verse 11
हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ
Verse 12
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ 178(ख)
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