Book 1 • Chapter 177
Section 177
10 verses
Verse 1
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई परम उग्र नहिं बरनि सो जाई
Verse 2
गयउ निकट तप देखि बिधाता मागहु बर प्रसन्न मैं ताता
Verse 3
करि बिनती पद गहि दससीसा बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा
Verse 4
हम काहू के मरहिं न मारें बानर मनुज जाति दुइ बारें
Verse 5
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा
Verse 6
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ
Verse 7
जौं एहिं खल नित करब अहारू होइहि सब उजारि संसारू
Verse 8
सारद प्रेरि तासु मति फेरी मागेसि नीद मास षट केरी
Verse 9
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु
Verse 10
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु
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