Book 1 • Chapter 18
Section 18
12 verses
Verse 1
कपिपति रीछ निसाचर राजा अंगदादि जे कीस समाजा
Verse 2
बंदउँ सब के चरन सुहाए अधम सरीर राम जिन्ह पाए
Verse 3
रघुपति चरन उपासक जेते खग मृग सुर नर असुर समेते
Verse 4
बंदउँ पद सरोज सब केरे जे बिनु काम राम के चेरे
Verse 5
सुक सनकादि भगत मुनि नारद जे मुनिबर बिग्यान बिसारद
Verse 6
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा करहु कृपा जन जानि मुनीसा
Verse 7
जनकसुता जग जननि जानकी अतिसय प्रिय करुना निधान की
Verse 8
ताके जुग पद कमल मनावउँ जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ
Verse 9
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक चरन कमल बंदउँ सब लायक
Verse 10
राजिवनयन धरें धनु सायक भगत बिपति भंजन सुख दायक
Verse 11
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न
Verse 12
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न
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