Book 1 • Chapter 17
Section 17
12 verses
Verse 1
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू जाहि राम पद गूढ़ सनेहू
Verse 2
जोग भोग महँ राखेउ गोई राम बिलोकत प्रगटेउ सोई
Verse 3
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना जासु नेम ब्रत जाइ न बरना
Verse 4
राम चरन पंकज मन जासू लुबुध मधुप इव तजइ न पासू
Verse 5
बंदउँ लछिमन पद जलजाता सीतल सुभग भगत सुख दाता
Verse 6
रघुपति कीरति बिमल पताका दंड समान भयउ जस जाका
Verse 7
सेष सहस्त्रसीस जग कारन जो अवतरेउ भूमि भय टारन
Verse 8
सदा सो सानुकूल रह मो पर कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर
Verse 9
रिपुसूदन पद कमल नमामी सूर सुसील भरत अनुगामी
Verse 10
महावीर बिनवउँ हनुमाना राम जासु जस आप बखाना
Verse 11
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन
Verse 12
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर
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