Book 1 • Chapter 16
Section 16
10 verses
Verse 1
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि सरजू सरि कलि कलुष नसावनि
Verse 2
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी
Verse 3
सिय निंदक अघ ओघ नसाए लोक बिसोक बनाइ बसाए
Verse 4
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची कीरति जासु सकल जग माची
Verse 5
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू बिस्व सुखद खल कमल तुसारू
Verse 6
दसरथ राउ सहित सब रानी सुकृत सुमंगल मूरति मानी
Verse 7
करउँ प्रनाम करम मन बानी करहु कृपा सुत सेवक जानी
Verse 8
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता महिमा अवधि राम पितु माता
Verse 9
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद
Verse 10
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ
0:000:00
Speed: