Book 1 • Chapter 15
Section 15
13 verses
Verse 1
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता जुगल पुनीत मनोहर चरिता
Verse 2
मज्जन पान पाप हर एका कहत सुनत एक हर अबिबेका
Verse 3
गुर पितु मातु महेस भवानी प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी
Verse 4
सेवक स्वामि सखा सिय पी के हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके
Verse 5
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा
Verse 6
अनमिल आखर अरथ न जापू प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू
Verse 7
सो उमेस मोहि पर अनुकूला करिहिं कथा मुद मंगल मूला
Verse 8
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ बरनउँ रामचरित चित चाऊ
Verse 9
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती
Verse 10
जे एहि कथहि सनेह समेता कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता
Verse 11
होइहहिं राम चरन अनुरागी कलि मल रहित सुमंगल भागी
Verse 12
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ
Verse 13
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ
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