Book 1 • Chapter 181
Section 181
10 verses
Verse 1
कामरूप जानहिं सब माया सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया
Verse 2
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा देखि अमित आपन परिवारा
Verse 3
सुत समूह जन परिजन नाती गे को पार निसाचर जाती
Verse 4
सेन बिलोकि सहज अभिमानी बोला बचन क्रोध मद सानी
Verse 5
सुनहु सकल रजनीचर जूथा हमरे बैरी बिबुध बरूथा
Verse 6
ते सनमुख नहिं करही लराई देखि सबल रिपु जाहिं पराई
Verse 7
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई
Verse 8
द्विजभोजन मख होम सराधा सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा
Verse 9
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ
Verse 10
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ
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