Book 1 • Chapter 182
Section 182
17 verses
Verse 1
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा
Verse 2
जे सुर समर धीर बलवाना जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना
Verse 3
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी उठि सुत पितु अनुसासन काँधी
Verse 4
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही
Verse 5
चलत दसानन डोलति अवनी गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी
Verse 6
रावन आवत सुनेउ सकोहा देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा
Verse 7
दिगपालन्ह के लोक सुहाए सूने सकल दसानन पाए
Verse 8
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी देइ देवतन्ह गारि पचारी
Verse 9
रन मद मत्त फिरइ जग धावा प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा
Verse 10
रबि ससि पवन बरुन धनधारी अगिनि काल जम सब अधिकारी
Verse 11
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा हठि सबही के पंथहिं लागा
Verse 12
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी दसमुख बसबर्ती नर नारी
Verse 13
आयसु करहिं सकल भयभीता नवहिं आइ नित चरन बिनीता
Verse 14
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र
Verse 15
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र 182(क)
Verse 16
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि
Verse 17
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि 182ख
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