Book 1 • Chapter 183
Section 183
8 verses
Verse 1
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ
Verse 2
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा
Verse 3
देखत भीमरूप सब पापी निसिचर निकर देव परितापी
Verse 4
करहि उपद्रव असुर निकाया नाना रूप धरहिं करि माया
Verse 5
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला सो सब करहिं बेद प्रतिकूला
Verse 6
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं
Verse 7
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई देव बिप्र गुरू मान न कोई
Verse 8
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना
0:000:00
Speed: