Book 1 • Chapter 184
Section 184
8 verses
Verse 1
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा जे लंपट परधन परदारा
Verse 2
मानहिं मातु पिता नहिं देवा साधुन्ह सन करवावहिं सेवा
Verse 3
जिन्ह के यह आचरन भवानी ते जानेहु निसिचर सब प्रानी
Verse 4
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी परम सभीत धरा अकुलानी
Verse 5
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही जस मोहि गरुअ एक परद्रोही
Verse 6
सकल धर्म देखइ बिपरीता कहि न सकइ रावन भय भीता
Verse 7
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी
Verse 8
निज संताप सुनाएसि रोई काहू तें कछु काज न होई
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