Book 1 • Chapter 185
Section 185
10 verses
Verse 1
बैठे सुर सब करहिं बिचारा कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा
Verse 2
पुर बैकुंठ जान कह कोई कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई
Verse 3
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती
Verse 4
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ
Verse 5
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना
Verse 6
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं
Verse 7
अग जगमय सब रहित बिरागी प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी
Verse 8
मोर बचन सब के मन माना साधु साधु करि ब्रह्म बखाना
Verse 9
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर
Verse 10
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर
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