Book 1 • Chapter 194
Section 194
10 verses
Verse 1
ध्वज पताक तोरन पुर छावा कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा
Verse 2
सुमनबृष्टि अकास तें होई ब्रह्मानंद मगन सब लोई
Verse 3
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई सहज संगार किएँ उठि धाई
Verse 4
कनक कलस मंगल धरि थारा गावत पैठहिं भूप दुआरा
Verse 5
करि आरति नेवछावरि करहीं बार बार सिसु चरनन्हि परहीं
Verse 6
मागध सूत बंदिगन गायक पावन गुन गावहिं रघुनायक
Verse 7
सर्बस दान दीन्ह सब काहू जेहिं पावा राखा नहिं ताहू
Verse 8
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा
Verse 9
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद
Verse 10
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद
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