Book 1 • Chapter 195
Section 195
10 verses
Verse 1
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ
Verse 2
वह सुख संपति समय समाजा कहि न सकइ सारद अहिराजा
Verse 3
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती प्रभुहि मिलन आई जनु राती
Verse 4
देखि भानू जनु मन सकुचानी तदपि बनी संध्या अनुमानी
Verse 5
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी
Verse 6
मंदिर मनि समूह जनु तारा नृप गृह कलस सो इंदु उदारा
Verse 7
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी जनु खग मूखर समयँ जनु सानी
Verse 8
कौतुक देखि पतंग भुलाना एक मास तेइँ जात न जाना
Verse 9
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ
Verse 10
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ
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