Book 1 • Chapter 205
Section 205
10 verses
Verse 1
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई बन मृगया नित खेलहिं जाई
Verse 2
पावन मृग मारहिं जियँ जानी दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी
Verse 3
जे मृग राम बान के मारे ते तनु तजि सुरलोक सिधारे
Verse 4
अनुज सखा सँग भोजन करहीं मातु पिता अग्या अनुसरहीं
Verse 5
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा
Verse 6
बेद पुरान सुनहिं मन लाई आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई
Verse 7
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा मातु पिता गुरु नावहिं माथा
Verse 8
आयसु मागि करहिं पुर काजा देखि चरित हरषइ मन राजा
Verse 9
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप
Verse 10
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप
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