Book 1 • Chapter 210
Section 210
14 verses
Verse 1
प्रात कहा मुनि सन रघुराई निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई
Verse 2
होम करन लागे मुनि झारी आपु रहे मख कीं रखवारी
Verse 3
सुनि मारीच निसाचर क्रोही लै सहाय धावा मुनिद्रोही
Verse 4
बिनु फर बान राम तेहि मारा सत जोजन गा सागर पारा
Verse 5
पावक सर सुबाहु पुनि मारा अनुज निसाचर कटकु सँघारा
Verse 6
मारि असुर द्विज निर्मयकारी अस्तुति करहिं देव मुनि झारी
Verse 7
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया
Verse 8
भगति हेतु बहु कथा पुराना कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना
Verse 9
तब मुनि सादर कहा बुझाई चरित एक प्रभु देखिअ जाई
Verse 10
धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा हरषि चले मुनिबर के साथा
Verse 11
आश्रम एक दीख मग माहीं खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं
Verse 12
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी सकल कथा मुनि कहा बिसेषी
Verse 13
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर
Verse 14
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर
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