Book 1 • Chapter 217
Section 217
10 verses
Verse 1
मुनि तव चरन देखि कह राऊ कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ
Verse 2
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता आनँदहू के आनँद दाता
Verse 3
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि कहि न जाइ मन भाव सुहावनि
Verse 4
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू
Verse 5
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू पुलक गात उर अधिक उछाहू
Verse 6
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू चलेउ लवाइ नगर अवनीसू
Verse 7
सुंदर सदनु सुखद सब काला तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला
Verse 8
करि पूजा सब बिधि सेवकाई गयउ राउ गृह बिदा कराई
Verse 9
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु
Verse 10
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु
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