Book 1 • Chapter 218
Section 218
10 verses
Verse 1
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी जाइ जनकपुर आइअ देखी
Verse 2
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं
Verse 3
राम अनुज मन की गति जानी भगत बछलता हिंयँ हुलसानी
Verse 4
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई बोले गुर अनुसासन पाई
Verse 5
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं
Verse 6
जौं राउर आयसु मैं पावौं नगर देखाइ तुरत लै आवौ
Verse 7
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती कस न राम तुम्ह राखहु नीती
Verse 8
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता प्रेम बिबस सेवक सुखदाता
Verse 9
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ
Verse 10
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ
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