Book 1 • Chapter 223
Section 223
10 verses
Verse 1
बोली अपर कहेहु सखि नीका एहिं बिआह अति हित सबहीं का
Verse 2
कोउ कह संकर चाप कठोरा ए स्यामल मृदुगात किसोरा
Verse 3
सबु असमंजस अहइ सयानी यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी
Verse 4
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं
Verse 5
परसि जासु पद पंकज धूरी तरी अहल्या कृत अघ भूरी
Verse 6
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें
Verse 7
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी
Verse 8
तासु बचन सुनि सब हरषानीं ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी
Verse 9
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद
Verse 10
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद
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