Book 1 • Chapter 254
Section 254
10 verses
Verse 1
लखन सकोप बचन जे बोले डगमगानि महि दिग्गज डोले
Verse 2
सकल लोक सब भूप डेराने सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने
Verse 3
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं
Verse 4
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे प्रेम समेत निकट बैठारे
Verse 5
बिस्वामित्र समय सुभ जानी बोले अति सनेहमय बानी
Verse 6
उठहु राम भंजहु भवचापा मेटहु तात जनक परितापा
Verse 7
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा हरषु बिषादु न कछु उर आवा
Verse 8
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ
Verse 9
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग
Verse 10
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग
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