Book 1 • Chapter 253
Section 253
10 verses
Verse 1
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई तेहिं समाज अस कहइ न कोई
Verse 2
कही जनक जसि अनुचित बानी बिद्यमान रघुकुल मनि जानी
Verse 3
सुनहु भानुकुल पंकज भानू कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू
Verse 4
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं
Verse 5
काचे घट जिमि डारौं फोरी सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी
Verse 6
तव प्रताप महिमा भगवाना को बापुरो पिनाक पुराना
Verse 7
नाथ जानि अस आयसु होऊ कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ
Verse 8
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं जोजन सत प्रमान लै धावौं
Verse 9
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ
Verse 10
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ
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