Book 1 • Chapter 272
Section 272
10 verses
Verse 1
लखन कहा हँसि हमरें जाना सुनहु देव सब धनुष समाना
Verse 2
का छति लाभु जून धनु तौरें देखा राम नयन के भोरें
Verse 3
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू
Verse 4
बोले चितइ परसु की ओरा रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा
Verse 5
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही केवल मुनि जड़ जानहि मोही
Verse 6
बाल ब्रह्मचारी अति कोही बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही
Verse 7
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही
Verse 8
सहसबाहु भुज छेदनिहारा परसु बिलोकु महीपकुमारा
Verse 9
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर
Verse 10
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर
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