Book 1 • Chapter 28
Section 28
15 verses
Verse 1
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ
Verse 2
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा करउँ नाइ रघुनाथहि माथा
Verse 3
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती
Verse 4
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो
Verse 5
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं बिनय सुनत पहिचानत प्रीती
Verse 6
गनी गरीब ग्रामनर नागर पंडित मूढ़ मलीन उजागर
Verse 7
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी नृपहि सराहत सब नर नारी
Verse 8
साधु सुजान सुसील नृपाला ईस अंस भव परम कृपाला
Verse 9
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी भनिति भगति नति गति पहिचानी
Verse 10
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ जान सिरोमनि कोसलराऊ
Verse 11
रीझत राम सनेह निसोतें को जग मंद मलिनमति मोतें
Verse 12
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु
Verse 13
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु 28(क)
Verse 14
हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास
Verse 15
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास 28(ख)
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