Book 1 • Chapter 29
Section 29
14 verses
Verse 1
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी
Verse 2
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें
Verse 3
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही भगति मोरि मति स्वामि सराही
Verse 4
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी रीझत राम जानि जन जी की
Verse 5
रहति न प्रभु चित चूक किए की करत सुरति सय बार हिए की
Verse 6
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली
Verse 7
सोइ करतूति बिभीषन केरी सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी
Verse 8
ते भरतहि भेंटत सनमाने राजसभाँ रघुबीर बखाने
Verse 9
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान
Verse 10
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान 29(क)
Verse 11
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक
Verse 12
जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक 29(ख)
Verse 13
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ
Verse 14
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ 29(ग)
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